Sunday, August 9, 2009

श्री
हमारी वर्तमान स्थिती के यथास्थित ज्ञान के साथ
शिक्षाके प्रभावसे
निरंतर सेवा का लाभ उठाते हुए
होता हॆ
प्राकृतिक गुणसंवर्धन
जिसके द्वारा हो जाती हॆ
समष्टिसाधना सहजरुपसे!
बरसती हॆ गुरुकृपा ज्ञानधारा बनकर
जो बन जाती हॆ आधार सारे जीवनका!
जीवन का हर पल बन जाती हॆ अनुभूति
नित्यशुद्ध परमेश्वर के अस्तित्वकी.......
जो नित नयी सृष्टी बनाता,सजाता तथा सवांरता हॆ
हम सब जीवों के लिए!
उसकी असीम कृपा से प्रेरित
हर सांस बन जाती हॆ सहज प्राणायाम!
जो निरंतर हमें दीर्घायु , आरोग्य तथा ऎश्वर्य
प्रदान करती हॆ!
गुरुकृपाका यह आत्मप्रेरित (स्वयंप्रेरित) अभ्यास ही
बन जाती हॆ व्यष्टिसाधना जिसके लिए
किसी और साधन की आवश्यकता नही होती।
श्री.ग.अग्निहोत्री
(स्वानंदार्थ)

No comments:

Post a Comment